अक्टूबर की दोपहर, एक खाली कुर्सी की कहानी

अपने घर का एक छोटा दृश्य चुनेंअपने आंगन, बरामदे या कमरे की खाली कुर्सी को देखकर एक छोटा गद्य लिखें। भारत में अक्टूबर का मौसम हर जगह एक जैसा नहीं होता; जो आज आपके सामने है, उसी से शुरुआत करें। यह आपके अनुभव के लिए रूपरेखा है, कोई बनी-बनाई पारिवारिक स्मृति नहीं।

कुर्सी किस ओर देख रही है उसकी दिशा और पास की एक चीज़ का वर्णन करें। खिड़की, मेज़ या दीवार से उसका संबंध दृश्य खोल सकता है। किसी और के घर में झांककर या निजी जगह की तस्वीर लेकर विवरण जुटाने की ज़रूरत नहीं है।
रोशनी का एक टुकड़ा धूप हो तो उसका आकार देखें; न हो तो कमरे की वास्तविक रोशनी लिखें। मौसम को कविता जैसा बनाने के लिए धूप या ठंड न जोड़ें। एक सटीक अवलोकन कई सुंदर लेकिन काल्पनिक वाक्यों से अधिक असरदार हो सकता है।
आखिरी बार किसने बैठा था सिर्फ वही लिखें जो आपको सचमुच याद है और जिसे साझा करना उचित है। दूसरे व्यक्ति की भावना या संवाद न गढ़ें। याद धुंधली हो तो उसे धुंधली ही रहने दें, या इस कार्ड को अपनी आखिरी बैठक तक सीमित रखें।
आज आप उसके पास क्या कर रहे हैं अपनी क्रिया जोड़ें: कोई सूची लिखना, किताब रखना या कुछ देर ठहरना। इससे दृश्य में आपका स्थान आता है। खाली कुर्सी को अनिवार्य रूप से दुख या अनुपस्थिति का प्रतीक बनाने की जरूरत नहीं है।
अगली बार के लिए एक पंक्ति अंत में लिखें कि इस जगह को दोबारा कब या किस परिस्थिति में देखना चाहेंगे। तारीख रखें, पर घर का पूरा पता या रोज़ का समय सार्वजनिक न करें। अगला दृश्य अलग कार्ड होगा, पुराने अनुभव का संशोधन नहीं।
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