खाली खाने वाली डिब्बी — अक्टूबर की एक छोटी कहानी
यह एक कल्पित कहानी हैयह मौलिक लघुकथा है, किसी वास्तविक व्यक्ति या परिवार का अनुभव नहीं। अक्टूबर की एक दोपहर, पुरानी पेंसिल की डिब्बी में बची खाली जगह दो भाई-बहनों को एक नई बात करने का मौका देती है।
स्टेप 1
सात चीज़ें, आठ खाने
मीरा ने पुरानी डिब्बी खोली तो उसमें सात चीज़ें थीं और आठ खाने। उसने पेन, रबर और छोटी क्लिप गिनी। एक जगह खाली थी। उसे लगा कुछ खो गया है, लेकिन क्या, यह याद नहीं आया।
स्टेप 2
याद करने का मुकाबला
उसके भाई ने कहा वहां लाल पेंसिल होती थी। मीरा को नीला कटर याद था। दोनों ने कुछ देर अपनी याद को ज्यादा साफ़ बताया। फिर भाई ने पूछा, अगर दोनों चीज़ें अलग-अलग समय पर रही हों तो?
स्टेप 3
डिब्बी की पुरानी नौकरी
मीरा को याद आया कि यह डिब्बी कभी सिलाई के बटन भी रखती थी। भाई ने इसमें बस का टिकट छिपाया था। डिब्बी एक ही थी, पर दोनों ने उसे अलग-अलग काम दिए थे। खाली जगह किसी एक वस्तु की नहीं थी।
स्टेप 4
नई चीज़ की तलाश नहीं
वे चाहें तो खाली खाना किसी छोटी चीज़ से भर सकते थे। मीरा ने दराज़ की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। उसने एक कागज़ मोड़ा और लिखा: यहां अगली काम की चीज़ रखेंगे। भाई ने नीचे जोड़ा: मिल जाए तब।
स्टेप 5
खाली जगह बची रही
शाम को डिब्बी फिर बंद हो गई। उसमें अब भी कोई जरूरी चीज़ नहीं बढ़ी थी। फिर भी मीरा को वह अधूरी नहीं लगी। पहली बार खाली जगह खोई हुई चीज़ का संकेत नहीं, आने वाली चीज़ के लिए जगह थी।
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